Sunday, December 27, 2009

डॉ.राहत इन्दौरी के ग़ज़ल संग्रह का विमोचन 8 जनवरी को.

इन्दौर की अदबी फ़िज़ाँ को यश देने वाले नामचीन शायर डॉ.राहत इन्दौरी का नया ग़ज़ल संग्रह छपकर तैयार है और ख़ुशी की बात यह है कि ये हिन्दी में छपा है. दुनिया भर में अपनी शायरी से छा जाने वाले राहत भाई की इस नई किताब का इजरा(विमोचन) 8 जनवरी को प्रस्तावित है और इस मौक़े पर एक मुशायरा भी आयोजित किया जा रहा है. ख़बर है कि कोई मशहूर हस्ती राहत भाई के इस मजमुए का विमोचन करने इन्दौर तशरीफ़ ला सकती है. 2 जनवरी को राहत भाई का जन्मदिन है और इसके ठीक बाद यह कार्यक्रम होने जा रहा है.

Tuesday, July 8, 2008

इस मीठे शहर में…सदभाव हो रोशन

सदभाव था रोशन
इस मीठे शहर में
ये कौन यहॉं बो गया
दुःख-दर्द के रोपे
कौन इसे दे गया
नफ़रत के ये तोहफ़े
फूटे अब करुणा की नदी
इसकी नज़र से
अब और नहीं रोना इसे
मनहूस ख़बर से
ये व़क़्त है आओ
मिलजुल के विचारें
शांति से चलो आज
हमदर्दी उचारें
ग़ालिब की ग़ज़ल
तुलसी की चौपाई उधर से
हर एक डगर से
हर एक अधर से
इस मीठे शहर में
सदभाव हो रोशन


-नईदुनिया में प्रकाशित वरिष्ठ कवि श्री नरहरि पटेल की ताज़ा कविता.

Sunday, July 6, 2008

कर्फ़्यू के बाद थोड़ी हवा भी आने दो !

सारे चैनल देख लिये
सारे अख़बार पढ़ लिये
रिश्तेदारों से भारत भर
में बातें हो गईं
पडौसी से अबोला था
वह भी टूट गया
जो न पढ़ने थे

वे चिट्ठे भी पढ़ लिये
गली में क्रिकेट भी हो गया
दाल-चावल भी खा लिये कई बार
राजनीति भी हो ली
और ख़ून की होली
सारे शगुन तो हो गए
कर्फ़्यू भी चल गया दिन रात
सियासत की बिछी बिसात
अब थोड़ी हवा आने दो न

Friday, July 4, 2008

कर्फ़्यू के साये में ख़ामोश मेरे शहर से एक इल्तिजा !

नसीब से मिलता है
किसी शहर को अमन
नसीब से मिलती है धूप
गली मोहल्ले की रौनक़े
बच्चों की आवाज़ें,शोर

नसीब से मिलता है
दरवाज़े पर दूध
अख़बार और सब्ज़ियाँ
मिलते हैं नसीब से पास-पडौस
सोहबतें और ठहाके

नसीब से मिलता है
विश्वास,अपनापन और हँसी
नसीब से ही मिलते हैं
भाईचारे और जज़बात

नसीब से ही मिलता है
किसी शहर को इत्मीनान
सुक़ून की पहचान
और ज़िन्दगी बख़्शते अवाम

तो जो मिल गया है नसीब से
उसे मत गँवाइये
अपने शहर को उसकी पहचान दिलवाइये
उसे फ़िर रफ़्तार पर लाइये
रोकिये मत उसके स्पंदन को
आप ही को करना पड़ेगा ये सब
हाँ , करना ही पड़ेगा
क्योंकि कुछ काम नसीब के भरोसे
नहीं छोड़े जा सकते
उसके लिये कीजिये कुछ ऐसी जुम्बिश
कि दुनिया कहे इसी का नाम तो
है ज़िन्दादिली
शहर की ज़िन्दादिली उसमें
रहने वाले लोगों से होती है
वह आप से होती है
लोग जानते हैं
आप ज़िन्दादिल हैं.

ये सिर्फ़ एक शहर नहीं ; इंसानियत की आवाज़ है !

झुलस रहा मेरा शहर
कोई चाह रहा है करो इसे बंद
कोई चाह रहा है खुला रहे ये
ग़रीब कुलबुला रहा है महंगाई में
अमीर मना रहा है पिकनिक
उसे मिल गया है सप्ताहांत का एक बहाना
केसरिया ने कहा करो बंद
हरा कहेगा अब करो बंद
रंगो में बटा मेरा शहर
अमन पसंद है
इसकी तहज़ीब में
अमीर ख़ाँ की तान
और विष्णु चिंचालकर के रंग हैं
मैडम पद्मनाभन का है संस्कार
इसके स्वाद में है जलेबी-पोहे की चटख़ार
लौट आएगा ये शहर जल्द ही रूठे बेटे की तरह
सुबह का भूला जो ठहरा
अभी कहाँ गूँजी है पूरी तरह से स्कूल में
जा रहे नये बच्चों की किलकारियाँ
अभी कहाँ महकी है बारिश की बूँद
ये तो शहर है शानदार रिवायतों का
भूला देता है ज़ख़्म , लगा देता है मरहम
ये शहर है अरमानों का
जज़बातों का
नेक इरादों का
मुझे इस पर नाज़ है
ये सिर्फ़ एक शहर नहीं
इंसानियत की आवाज़ है

Tuesday, July 10, 2007


फ़िर आया है रफ़ी सा.
को याद करने का महीना
जुलाई का महीना बहुत तकलीफ़ देनेवाला है. इसी महीने में हमसे संगीतकार मदनमोहन,गायिका गीता दत्त बिछडीं और 31 जुलाई 1980 को रूख़सत हुए सर्वकालिक महान गायक मोहम्मद रफ़ी साहब.उनकी लोकप्रियता का अंदाज़ इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके जाने के सत्ताइस बरस बाद भी उन्हे भुलाया नहीं गया है और पूरी दुनिया में 31 जुलाई को किसी न किसी रूप में रफ़ी साहब की याद ताज़ा की जाती है. इन्दौर भी रफ़ी साहब को शिद्दत से याद करता है. इस साल रफ़ी साहब की याद का सिलसिला शुरू कर रही है...रंग-ए-महफ़िल. रफ़ी साहब की बरसी से तीन दिन पहले यानी 28 जुलाई इन्दौर के आनन्द मोहन माथुर सभागार (स्कीम 54) में रात आठ बजे मुंबई के ज्योतिराम अय्यर और अनिल वाजपेयी "गाता जाए बंजारा" शीर्षक से एक लाजवाब प्रस्तुति देंगे. रफ़ी साहब को याद करने का इससे बेहतर तरीक़ा और क्या हो सकता है कि उन्ही की कालजयी रचनाओं का रसपान किया जाए.कार्यक्रम आमंत्रितों के लिये है .इस ख़बर के साथ जो चित्र आप देख रहे हैं दर-असल वह भारतीय डाक तार विभाग द्वारा रफ़ी साहब के सम्मान में जारी किया गया डाक टिकिट है..ये सुरीला गुलूकार वाक़ई ऐसे कई सम्मानों का हक़दार है लेकिन यह सर्वविदित है कि रफ़ी साहब ने कभी किसी इनाम-इक़राम की परवाह नहीं की. 31 जुलाई को जिस प्यार से दुनिया उन्हे याद करती है ; वही किसी कलाकार का सच्चा सम्मान है. तो वक़ निकालिये और इस महीने में ज़रा ग़ौर से रफ़ी साहब को सुनिये..आप महसूस करेंगे रफ़ी साहब यहीं हैं...यहीं कहीं हैं.

Thursday, July 5, 2007



दुनियाभर में दमकती सुरीली कल्पना
वे पचास की हो गयीं हैं.मालवा में पं.कुमार गंधर्व को लाकर बसाने वाले कुमारजी के अनन्य सखा मामा साहेब मुजुमदार की यशस्वी पुत्री कल्पना झोकरकर इन्दौर के संगीत को अब विश्वव्यापी पहचान देने में मसरूफ़ हैं . कल्पना ने अपने जीवन के सुरीले पचास बसंत अभी 25 जून को पूरे कर लिये.पं.भीमसेन जोशी के संयोजन में आयोजित होने वाले पुणे के सवाई गंधर्व संगीत समारोह में दो बार शिरकत कर चुकीं कल्पना को पं.जोशी की दिवंगत पत्नी वत्सला जोशी के नाम से स्थापित सम्मान की प्रथम कलाकार होने का सौभाग्य भी प्राप्त है.कल्पना की ख़ासियत यह है कि वे शास्त्रीय,सुगम,उप-शास्त्रीय,मराठी नाट्य संगीत और चित्रपट संगीत ..सभी विधाओं में लाजवाब गातीं हैं .उन्हे आकाशवाणी की राष्ट्रीय प्रतियोगिता के सुगम एवं शास्त्रीय दोनों विधाओं में पुरस्कृत होने का फ़ख्र हासिल है. कल्पना झोकरकर ख़ूब गा रहीं हैं और इनदिनों उनका ज़्यादातर समय देश के बडे़ शहर में होने वाले जलसों में बीत रहा है.वे ख़ुद तो यश पा ही रहीं हैं शहर इन्दौर की सांगीतिक पहचान को भी विस्तार दे रहीं हैं.कल्पन झोकरकर के काम और नाम को देखकर इस बात की तसल्ली होती है कि यदि कोई किसी एक विधा में लगातार काम करने की ठान ले तो वाक़ई कुछ मुश्किल नहीं हालाँकि कल्पना बेहतर बता सकतीं हैं कि उन्हे इस मुकाम तक आने के लिये क्या क्या जद्दोजहद करनी पडी़ है.लेकिन यह निर्विवाद सत्य है कि तपस्या का प्रतिफ़ल तो मिलता ही है किसी को जल्दी किसी को पचास तक आते आते ...कल्पना झोकरकर का स्वर अब सुवर्ण स्वर बने ..इन्दौरनामा की दुआएं.
आप यदि कल्पना झोकरकर को अपनी शुभकामना देना चाहें तो kalapanazokarkar@yahoo.com पर ईमेल कर सकते हैं . कभी वक़्त मिले तो उनकी वेबसाइट की सैर करें:www.kalpanazokarkar.com